आज कल रिश्ते बोझ क्यूँ लगते हैं?
ठहठहाते पल खोज क्यूँ लगते हैं?
क्यों नहीं "मैं" खोता "हम" में?
क्यूँ नहीं खुश रहते कम में?
सुख का ये कैसा भ्रम है?
कल का काफी आज कम है.
सुख की इस अंधी दौड़ में,
हिंसा-प्रेम की खुली चौड़ में.
शांति का हो गया निधन
हंसी खोखली ख़ुशी दमन.
सच्चा केवल मौन व्रत,
कल आज हमेशा सत.