Tuesday, August 2, 2011

एक के सहारे

एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है,
एक के सहारे 
दुनिया संवर जाती है. 

भूख, प्यास, बीमारी भी,
आती निकल जाती है,
एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है.

दुःख दर्द संवेदना, 
न छाप छोड़ पाती है,
एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है.

ख़ुशी बिना कारण ही
घर में घर कर जाती है
एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है.

जीवन की नाइंसाफ़ी भी,
समझौता कर पाती है, 
एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है.

रूठे रिश्ते, टूटी आशा,
न जीवन को कचोट पाती है,
एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है.

आधी अधूरी ख्वाईशों,
में भी संतुष्टि हो जाती है,
एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है.

आधे मन, आधे तन, 
आधे जीवन की पूर्ती हो जाती है, 
एक के सहारे 
ज़िन्दगी गुज़र जाती है.




मुझे काला अच्छा लगता है

काले अँधेरे में भी, काली आँखें दिख जाती हैं,
काले अँधेरे में ही, रौशनी जगमगाती है I

काली उँगलियों में सुनहरी, बांसुरी झिलमिलाती है,
काली जमुना के तेज़ पर, अदभुत राग ये सजाती है. 

काली कमर पर ही पीला, अपना पीलापन पाता है,
काले पैरों के ही तलवों पर, लाल लाल हो पाता है.

काले हाथों में ही तो, कोरा माखन उजलाता है,
काले मुख पर ही मोर पंख, चका चौंध फैलता है. 

Sunday, February 13, 2011

काट दो ये पर

कटे पर में कभी
नहीं सोचेगी उड़ने की.
कटे पर में कभी
नहीं सोचेगी मुड़ने की.

बांध दो ये पैर
क्या ज़रुरत है भागने की?
बांध दो ये पैर
क्या ज़रुरत है लांघने की?

बंद करो ये मुंह
बातें नहीं पसंन्द मुझे.
बंद करो ये मुंह
सुनना नहीं पसंद मुझे.

ढक दो ये चेहेरे
किसी घूंघट या नकाब से.
ढक दो ये चेहेरे
मुझे लगते हैं ख़राब से.

बंद करो ये आँखें 
काटती ये अर्थ हैं.
बंद करो ये आँखें 
जीवन इसका व्यर्थ है. 


Monday, January 24, 2011

ऐसा क्यूँ होता है?

क्यूँ हम अपने अन्तःमन को
पहना नहीं पाते कवच?
क्यूँ फ़िज़ूल की बातों में
छुप जाता है शाश्वत सच?

क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
प्रेम, द्वेष, लगाव से?
क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
सतज्ञान के अभाव से?

क्यूँ रह रह मन में उठती
है कोई पाने की इच्छा?
क्यूँ रह रह मन में घुटती
साफ़ सरल सटीक स्वेच्छा?

क्यूँ मन कठोर नहीं होता?
क्यूँ आँखें सुख पाती नहीं?
क्यूँ किसी को खोने के डर से?
खुशियाँ भी भाती नहीं.

क्यूँ ये समझ नहीं आता?
शाश्वत केवल श्याम है.
क्यूँ ये समझ नहीं आता?
माया के बाद विराम है. 

कहाँ है शांति?

हिमालय कि चोटी पर या
दुनिया कि कसौटी पर?
दिन के उजाले में या
रात के सन्नाटे में?

मन के लगाव में या
प्यार के अभाव में?
दिल के सौदे में या
एकांत के घाटे में?

भगवन के चरण में या
नाम के स्मरण में?
बैठे अकेले नांव में या
किसी आँचल कि छाँव में?

मोर के शोर में या
बाघ की दहाड़ में?
चींटी के व्यवहार में या
दान और उपकार  में?

इच्छा और परीक्षा में या
कल कल बहती दीक्षा में?
जंगल और गाँव में या
माया के पाँव में?

क्या यही ढूंढते ढूंढते
निकल जायेगा यह जीवन भी?
या कभी मिल पायेगी मुझे
ये काल्पनिक शाश्वत शांति.