Tuesday, August 2, 2011

मुझे काला अच्छा लगता है

काले अँधेरे में भी, काली आँखें दिख जाती हैं,
काले अँधेरे में ही, रौशनी जगमगाती है I

काली उँगलियों में सुनहरी, बांसुरी झिलमिलाती है,
काली जमुना के तेज़ पर, अदभुत राग ये सजाती है. 

काली कमर पर ही पीला, अपना पीलापन पाता है,
काले पैरों के ही तलवों पर, लाल लाल हो पाता है.

काले हाथों में ही तो, कोरा माखन उजलाता है,
काले मुख पर ही मोर पंख, चका चौंध फैलता है. 

No comments:

Post a Comment