Monday, January 24, 2011

ऐसा क्यूँ होता है?

क्यूँ हम अपने अन्तःमन को
पहना नहीं पाते कवच?
क्यूँ फ़िज़ूल की बातों में
छुप जाता है शाश्वत सच?

क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
प्रेम, द्वेष, लगाव से?
क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
सतज्ञान के अभाव से?

क्यूँ रह रह मन में उठती
है कोई पाने की इच्छा?
क्यूँ रह रह मन में घुटती
साफ़ सरल सटीक स्वेच्छा?

क्यूँ मन कठोर नहीं होता?
क्यूँ आँखें सुख पाती नहीं?
क्यूँ किसी को खोने के डर से?
खुशियाँ भी भाती नहीं.

क्यूँ ये समझ नहीं आता?
शाश्वत केवल श्याम है.
क्यूँ ये समझ नहीं आता?
माया के बाद विराम है. 

कहाँ है शांति?

हिमालय कि चोटी पर या
दुनिया कि कसौटी पर?
दिन के उजाले में या
रात के सन्नाटे में?

मन के लगाव में या
प्यार के अभाव में?
दिल के सौदे में या
एकांत के घाटे में?

भगवन के चरण में या
नाम के स्मरण में?
बैठे अकेले नांव में या
किसी आँचल कि छाँव में?

मोर के शोर में या
बाघ की दहाड़ में?
चींटी के व्यवहार में या
दान और उपकार  में?

इच्छा और परीक्षा में या
कल कल बहती दीक्षा में?
जंगल और गाँव में या
माया के पाँव में?

क्या यही ढूंढते ढूंढते
निकल जायेगा यह जीवन भी?
या कभी मिल पायेगी मुझे
ये काल्पनिक शाश्वत शांति.