Monday, January 24, 2011

ऐसा क्यूँ होता है?

क्यूँ हम अपने अन्तःमन को
पहना नहीं पाते कवच?
क्यूँ फ़िज़ूल की बातों में
छुप जाता है शाश्वत सच?

क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
प्रेम, द्वेष, लगाव से?
क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
सतज्ञान के अभाव से?

क्यूँ रह रह मन में उठती
है कोई पाने की इच्छा?
क्यूँ रह रह मन में घुटती
साफ़ सरल सटीक स्वेच्छा?

क्यूँ मन कठोर नहीं होता?
क्यूँ आँखें सुख पाती नहीं?
क्यूँ किसी को खोने के डर से?
खुशियाँ भी भाती नहीं.

क्यूँ ये समझ नहीं आता?
शाश्वत केवल श्याम है.
क्यूँ ये समझ नहीं आता?
माया के बाद विराम है. 

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