Monday, January 24, 2011

कहाँ है शांति?

हिमालय कि चोटी पर या
दुनिया कि कसौटी पर?
दिन के उजाले में या
रात के सन्नाटे में?

मन के लगाव में या
प्यार के अभाव में?
दिल के सौदे में या
एकांत के घाटे में?

भगवन के चरण में या
नाम के स्मरण में?
बैठे अकेले नांव में या
किसी आँचल कि छाँव में?

मोर के शोर में या
बाघ की दहाड़ में?
चींटी के व्यवहार में या
दान और उपकार  में?

इच्छा और परीक्षा में या
कल कल बहती दीक्षा में?
जंगल और गाँव में या
माया के पाँव में?

क्या यही ढूंढते ढूंढते
निकल जायेगा यह जीवन भी?
या कभी मिल पायेगी मुझे
ये काल्पनिक शाश्वत शांति.


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