Sunday, February 13, 2011

काट दो ये पर

कटे पर में कभी
नहीं सोचेगी उड़ने की.
कटे पर में कभी
नहीं सोचेगी मुड़ने की.

बांध दो ये पैर
क्या ज़रुरत है भागने की?
बांध दो ये पैर
क्या ज़रुरत है लांघने की?

बंद करो ये मुंह
बातें नहीं पसंन्द मुझे.
बंद करो ये मुंह
सुनना नहीं पसंद मुझे.

ढक दो ये चेहेरे
किसी घूंघट या नकाब से.
ढक दो ये चेहेरे
मुझे लगते हैं ख़राब से.

बंद करो ये आँखें 
काटती ये अर्थ हैं.
बंद करो ये आँखें 
जीवन इसका व्यर्थ है. 


Monday, January 24, 2011

ऐसा क्यूँ होता है?

क्यूँ हम अपने अन्तःमन को
पहना नहीं पाते कवच?
क्यूँ फ़िज़ूल की बातों में
छुप जाता है शाश्वत सच?

क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
प्रेम, द्वेष, लगाव से?
क्यूँ नहीं हैं मुक्त हम
सतज्ञान के अभाव से?

क्यूँ रह रह मन में उठती
है कोई पाने की इच्छा?
क्यूँ रह रह मन में घुटती
साफ़ सरल सटीक स्वेच्छा?

क्यूँ मन कठोर नहीं होता?
क्यूँ आँखें सुख पाती नहीं?
क्यूँ किसी को खोने के डर से?
खुशियाँ भी भाती नहीं.

क्यूँ ये समझ नहीं आता?
शाश्वत केवल श्याम है.
क्यूँ ये समझ नहीं आता?
माया के बाद विराम है. 

कहाँ है शांति?

हिमालय कि चोटी पर या
दुनिया कि कसौटी पर?
दिन के उजाले में या
रात के सन्नाटे में?

मन के लगाव में या
प्यार के अभाव में?
दिल के सौदे में या
एकांत के घाटे में?

भगवन के चरण में या
नाम के स्मरण में?
बैठे अकेले नांव में या
किसी आँचल कि छाँव में?

मोर के शोर में या
बाघ की दहाड़ में?
चींटी के व्यवहार में या
दान और उपकार  में?

इच्छा और परीक्षा में या
कल कल बहती दीक्षा में?
जंगल और गाँव में या
माया के पाँव में?

क्या यही ढूंढते ढूंढते
निकल जायेगा यह जीवन भी?
या कभी मिल पायेगी मुझे
ये काल्पनिक शाश्वत शांति.


Thursday, December 30, 2010

आज मन उदास है !

शून्य शांति शपथ क्षणिक
शुरू अंत काल्पनिक
शाम हुई आँख खुली
शूल शब्द सूली

सुबह सवेरा हैं कथित
खुली धुप मनगढ़ित
शाश्वत है अँधेरा
दुःख दर्द डेरा

हवा पानी आग से
धुएं और भाप से
रक्षा करे बसेरा
काटे वही डेरा

खून और आग को
बकरी और बाघ को
पंछी का पिंजरा
लागे ये डेरा

सत्ताखोरी

ऊँट पटांग ऊँट की टांग
पकड़ा मुर्गा, निकली बाँग. 
पर क्यूँ पकडे हम मुर्गे को? 
पड़े रहो सब पीकर भांग. 

बाँग लगी तो पोल खुलेगी,
ऊपर तक सबकी नींद खुलेगी,
मुर्गा बन जायेगा बकरा,
बलि एक, दोषी सत्रह.

तो इससे पहले कि बात बढे,
लोगों को कोई भनक पड़े,
मुर्गे के मुंह मारो पैसा,
सब चुपचाप, सब फिर वैसा.

वैसे भी सब खाते हैं,
मुहबोली वो पाते हैं.
चौंकने कि क्या है वजह,
प्रजा वैसी जैसा राजा.


[Translation for all angrez peepal]


Sattakhore

Patang camel camel's leg
Caught cock crow turned out. 
Why we caught on to chicken? 
Have all be drinking hemp. 

Crow began to open the poll,
To open up everyone's sleep,
Cock will become a goat,
Sacrifice a convicted seventeen.

So before you point increased,
People have no clue,
Die mouth of chicken money
All quiet like that all over again.

It is all to eat
Mauhboli find it.
Chauncne that's why,
People like that as king . ]